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जिनभक्ति से आनंदित हो आष्टाहि्नक पर्व के बाद जैन श्रावक करते है रंगोत्सव

 जतारा । भावलिंगी श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी हम सभी का जन्म हुआ है। क्या जन्म लेने से पूर्व हमने विचार किया था कि मैं इस परिवार में जन्म लूंगा ? ऐसे धनाढ्य परिवार में जन्मूंगा। क्या ऐसा विचार करने से आप वहां जन्म ले सकते हैं ? नहीं न। वास्तव में आप अपने विचारानुसार सब कुछ प्राप्त नहीं कर सकते। हां, इतना जरूर है कि जब आप भगवान महावीर स्वामी की वाणी से परिचित होते हैं, भगवान की वाणी की श्रद्धा करते हैं तो यह विवेक आपको जागृत होता हैं कि, मैं जैसे अपने परिणाम रखूंगा उन परिणामों के अनुसार ही मेरा भविष्य निर्मापित होगा। वर्तमान में किए जाने वाला कर्म ही भविष्य में उसी के अनुसार फल प्रदान करने वाला बन जाता है। 
ऐसा मंगल प्रवचन जतारा नगर में विराजमान भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए दिया। आचार्य श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा -जीवन जीतें हुए हम जैसे शुभ परिणाम अन्य प्राणियों के प्रति रखते है वास्तव में, हम उन प्राणियों के साथ अच्छे संबंध-व्यवहार बनाने के साथ ही अपने लिए अपना भविष्य सुरक्षित और सुखमय बना लिया करते हैं।
अभी होली का पर्व चल रहा है जो हमें शिक्षा देता हैं कि हम कभी किसी के प्रति कटु-खोटा व्यवहार न करें  हमेशा प्रेम,मैंत्री, वात्सल्य भाव के साथ अपना जीवन मंगलमय बनायें। जैन धर्म के आष्टाहि्नक पर्व अभी अभी पूर्ण हुए हैं। आष्टाहि्नक पर्व के आठ दिनों में जैन श्रावक जिनेंद्र भगवान की महा आराधना संपन्न करता है पश्चात प्रभु की भक्ति से प्रसन्न हुआ आत्मीय जनों के साथ रंगोत्सव करता हुआ भक्ति के आनंद को जाहिर करता है। जैन धर्म के यह पर्व शाश्वत हुआ करते हैं जिनमें स्वर्ग के देवगण भी अरिहंत भगवान की महामह पूजन संपादित किया करते है। वर्तमान में संयोगवश इस पर्व का नाम "होली" नाम से जाना जाने लगा ।
 93 वर्ष की उम्र में कर रहे हैं आत्मसाधना परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज के संघस्थ शिष्य क्षुल्लक श्री विश्वाभसागर जी महाराज अपनी आयु के 93 वें वर्ष में भी आत्मसाधना कर रहे हैं। पिछले 12 वर्षो से अपने आचार्य गुरुवर के श्री चरणों मे अपनी आत्मसाधना को बढा़ते हुए, आज 08 मार्च बुधवार को सल्लेखना की ओर अग्रसर हो रहे हैं। संसार के सभी जीवों को क्षमा करके और प्राणी मात्र से क्षमा मांगते हुए उन्होंने अपने गुरुवर आचार्य श्री से मुनि दीक्षा हेतु निवेदन किया एवं अपने उत्तम समाधिमरण की भावना व्यक्त की। साधक की प्रार्थना सुनकर आचार्य श्री ने उन्हें उत्तम समाधि की साधना का मंगलमय शुभाशीष प्रदान किया। आचार्य श्री के संघस्थ साधुगण उनकी समाधि की साधना में सहयोगी बन रहे हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुभाष सिंघई जी का सम्मान किया गया भारतीय जैन संगठन तहसील अध्यक्ष एवं जैन समाज प्रवक्ता अशोक कुमार जैन ने बताया कि कार्यक्रम के पूर्व नगर के साहित्यकार सुभाष सिंघई का गुरुदेव के समझ, जतारा जैन समाज द्वारा सम्मान किया गया। सुभाष सिंघई ने नगर गौरव श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी के ऊपर एक खंडकाव्य "नगर जतारा ध्रुव तारा" व बुंदेली पूजन की रचना की है। कार्यक्रम में महेंद्र टानगा, अजित माते, प्रदीप रानीपुर, राजेश माते, राजीव मोदी, गुलाब पटवारी, अरविंद चौधरी सहित लखनऊ, बाराबंकी, महमूदाबाद, आगरा, एटा, देवेंद्रनगर, टीकमगढ़ आदि जगहों से आए श्रावकों सहित भारी संख्या में धर्म प्रेमी उपस्थित रहे ।
कार्यक्रम का संचालन पत्रकार अशोक जैन द्वारा किया गया ।

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