कारी बीट-2 के RF-52 में नए अतिक्रमण का आरोप, वनरक्षक जुगल किशोर नामदेव पर आरोप, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और कमीशनखोरी की जांच की मांग
टीकमगढ़ । वन विभाग की कार्यप्रणाली पर लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विभागीय सूत्रों और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कारी बीट नंबर-2 के कक्ष क्रमांक RF-52 में वनभूमि पर नया अतिक्रमण कराया गया है, जिसकी बताई गई जीपीएस लोकेशन 24°49.90 N, 78°53.76 E है। आरोप है कि वनरक्षक जुगल किशोर नामदेव और उनके सहयोगियों ने वरिष्ठ अधिकारियों के मार्गदर्शन में बड़े लेनदेन के बाद चंद दिनों में वनभूमि पर दोबारा कब्जा कराया और उनकी मौजूदगी में जुताई भी कराई गई।
ज्ञात हो कि जुगल किशोर नामदेव पर इससे पहले भी 5 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की कथित वसूली कर करीब 20 हेक्टेयर वनभूमि पर कब्जा करवाने के आरोप लग चुके हैं। इस संबंध में समाचार प्रकाशित होने के बावजूद ग्रामीणों का आरोप है कि जांच तो दूर, संबंधित कर्मचारी से जवाब तक नहीं लिया गया। सवाल सीधा है, यदि शिकायत गलत थी तो जांच क्यों नहीं हुई और यदि सही थी तो कार्रवाई क्यों नहीं?
सूत्रों ने वनमण्डल अधिकारी, उप वनमण्डल अधिकारी, रेंजर टीकमगढ़ और परिक्षेत्र सहायक कारी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि नए अतिक्रमण को वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण मिला। साथ ही आरोप है कि जुगल किशोर को कारी बीट-2 से भारमुक्त नहीं किया जा रहा, जिससे अवैध कमाई का सिस्टम चलता रहे।
स्थानांतरण हुए पर व्यवस्था नहीं बदली, कागजी खेल पर उठे सवाल
इसी क्रम में अमन प्रजापति और चउदे प्रसाद सौर के स्थानांतरण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों का आरोप है कि जतारा से टीकमगढ़ स्थानांतरण के बावजूद दोनों कर्मचारी वनभूमि पर कथित कब्जे, उत्खनन और अवैध परिवहन से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रहे और वरिष्ठ स्तर तक कथित कमीशन पहुंचता रहा।
सूत्रों के मुताबिक चउदे प्रसाद ने टीकमगढ़ रेंज कार्यालय में ज्वाइनिंग दर्ज कराने के बाद प्रभार लेने से इनकार किया और पुनः जतारा पहुंचकर पुराने कार्य में लग गए। आरोप है कि टीकमगढ़ रेंजर सौरभ जैन भी उन्हें वास्तविक रूप से पदभार ग्रहण करते नहीं देखना चाहते, क्योंकि इससे पनियाराखेरा का जमा-जमाया सिस्टम प्रभावित हो सकता है। सूत्रों ने यह तक आरोप लगाया कि चउदे प्रसाद के टीकमगढ़ आने पर जतारा से वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने वाली ‘मिठाई’ बंद हो सकती है।
अमन प्रजापति के जतारा क्षेत्र में वनभूमि पर कथित कब्जे तथा इस्माइल खान को कुड़ीला का चार्ज देने के बावजूद खरगापुर से भारमुक्त नहीं करने पर भी सवाल हैं। आरोप है कि खरगापुर में आरा मशीन संचालकों से अवैध वसूली के कारण उन्हें वहीं बनाए रखा गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि नए कर्मचारी के आने पर ‘सिस्टम’ दोबारा खड़ा करने में समय लगेगा।
सूत्रों का कहना है कि स्थानांतरण और पदस्थापना के नाम पर कागजों में पूरी कार्रवाई दिखाकर प्रदेश स्तर के अधिकारियों को गुमराह किया जा रहा है, जबकि जमीन पर व्यवस्था जस की तस है। यदि वनभूमि पर कब्जे, अवैध जुताई, उत्खनन, परिवहन और वसूली के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं तो फिर ठोस जांच और कार्रवाई कब होगी?
गश्ती मार्ग के कमीशन से लेकर ‘फर्जी खातों’ तक गंभीर आरोप
विश्वस्त सूत्रों ने कारी बीट-2 के गश्ती मार्ग उन्नयन कार्य में कमीशन का हिसाब पूरा नहीं होने को भी जुगल किशोर को भारमुक्त नहीं किए जाने का कारण बताया है। इसकी पुष्टि के लिए माप-पुस्तिका, भुगतान अभिलेख, डीआर पंजी, स्वीकृत स्टीमेट, कार्य की वास्तविक एवं दर्ज लोकेशन तथा शासन की गाइडलाइन की जांच जरूरी है।
वहीं रेंजर सौरभ जैन पर वनभूमि पर कब्जे करवाने और ‘फर्जी खातों’ के माध्यम से वानिकी कार्य कराने का गंभीर आरोप लगाया गया है। सूत्रों के अनुसार स्थानीय मजदूरों के बजाय बालाघाट, घुवारा, उज्जैन, इंदौर सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों के लोगों के खाते वानिकी कार्यों में लगाए गए, जिनमें कुछ व्यापारी और आयकर रिटर्न दाखिल करने वाले लोग भी बताए जा रहे हैं। इस संबंध में वनमण्डल अधिकारी और कलेक्टर टीकमगढ़ को शिकायत दिए जाने के बाद भी कार्यवाही ना होना , भ्रष्टाचार और अधिकारियों की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
शिकायतकर्ता सूत्रों का आरोप है कि मामला दबा दिया गया और अब इसे ईओडब्ल्यू एवं लोकायुक्त के समक्ष ले जाने की तैयारी है।
कारी बीट-2 के आर एफ -52, जीपीएस लोकेशन 24°49.90 N, 78°53.76 E, 20 हेक्टेयर पुराने कब्जे, नए अतिक्रमण और वानिकी कार्यों में इस्तेमाल खातों की निष्पक्ष जांच से वास्तविकता सामने आ सकती है। ग्रामीणों की मांग है कि स्थानीय विभागीय अधिकारियों के बजाय वरिष्ठ स्तर की स्वतंत्र टीम मौके पर पहुंचकर सीमांकन, सत्यापन, अतिक्रमण, जुताई, स्थानांतरण अभिलेख, शिकायतों, गश्ती मार्ग, वित्तीय रिकॉर्ड और खातों की जांच करे।
वनभूमि किसी कर्मचारी की निजी जागीर नहीं है। यदि संरक्षण में अतिक्रमण हुआ है तो संरक्षणदाताओं पर भी कार्यवाही होनी चाहिए। अब निगाहें भोपाल और छतरपुर के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं, क्या वे कागजों के बाहर निकलकर जमीन पर जांच करेंगे, या गंभीर आरोप फिर एक बार फाइलों और कमीशनखोरी में दबकर रह जाएंगे?
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